बुधवार, 10 जुलाई 2024

मीडिया शोध को मापदंडों की कसौटी पर कसने की जरूरत

अब समय आ गया है कि मीडिया की समूची विकास-गाथा के साथ शोध को जोड़ 
दिया जाए। पिछले एक साल में खास तौर से तमाम घटनाक्रमों को सामने लाता 
मीडिया खुद भी एक खबर बना है। कैमरे के पीछे की सिलवटों पर अपकी चर्चाएं 
हुई हैं जिनमें से कुछ को यह कहकर भी हवा कर दिया गया कि ऐसा करने 
मजबूरी था। मीडिया अब एक ऐसा स्तंभ बन गया है जिसका आकार अक्सर 
बाकी स्तंभों से बड़ा दिखता है। लेकिन यह भी नकारा नहीं जा सकता कि जब 
विकास हो रहा हो तो यात्रा की गंभीरता को मापना और उसकी विवेचना भी जरूरी 
हो जाती है। दुनिया का सबसे प्रखर मीडिया है हमारे पास पर प्रखर मीडिया 
चिंतन नहीं। मापदंडों की कसौटी पर कसने के लिए या तो समय नहीं हमारे पास 
या फिर वैसी अभी भी जरूरत महसूस नहीं होती। मीडिया का पाठ्यक्रम भी इस 
तुरत-फुरत का लगता है कि वहां शोध के लिए बड़ा मंच तैयार नहीं हो सका है। 
जिस दौर में हम जी रहे हैं, वहां मीडिया के मनन लिए शोधार्थी भी बनना होगा 
ताकि आने वाले समय के लिए हमारे पास इस विकास का निचोड़ भी हो।

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