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उद्घाटन सत्र में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. टी.एन. सिंह ने बतौर मुख्य अतिथि कहा कि कोरोना के बाद की स्थितियों ने एक नये तरह के अवसर पैदा किया है। इस बीच तकनीकी का कई रूपों में विकास हुआ है। ये सभी तकनीकी हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम हैं। ऑनलाइन संकाय संवर्धन प्रोग्राम का आयोजन इस बदली हुई परिस्थितियों में इसी का उदाहरण है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए गुजरात विद्यापीठ के कुलपति प्रो0 अनामिक शाह ने न्यू मीडिया प्रौद्योगिकी के महत्व पर प्रकाश डाला और कहा कि ऑनलाइन शिक्षा को मजबूत करने के लिए ई-कंटेंट उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है, निश्चित ही विद्यार्थियों को इसका लाभ मिलेगा।
कार्यक्रम के तकनीकी सत्र में बतौर विषय विशेषज्ञ अपना व्याख्यान देते हुए प्रसिद्ध डाटा एनिलिस्ट एवं रिसर्चर डॉ० भरत खुशलानी ने कहा कि वर्तमान दौर के छात्रों की कम्प्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट तकनीकी तक पहुंच आसान हुई है। इसलिए शिक्षा में तकनीकी प्रयोग बहुत ही उपयोगी साबित होता जा रहा है। आवश्यक है कि शि़क्षक में भी वीडियो बनाने, ऑडियो रिकार्ड करने और ई-कंटेंट तैयार करने का कौशल हो। आगे उन्होंने कहा कि कक्षा में श्रव्य व वीडियो रिकार्डिंग की उत्तम व्यवस्था कर ई-कंटेंट की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।
दूसरे दिन- प्रथम सत्र में गुरू जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय हिसार के प्रो0 उमेश आर्या ने कहा कि गूगल पर सूचनाओं का भंडार है, ऐसे में सामान्य सर्च के दौरान ऐसे परिणाम ज्यादा आते हैं जो अपेक्षित नहीं होते और उपयोग की दृष्टि से इनका महत्व कम होता है। सूचना सर्च की कुछ टेक्निक्स को अपनाकर अनुपयोगी परिणाम से बचा जा सकता है। इस टेक्निक्स में कुछ की-वर्ड और चिह्न शामिल है।
दूसरे सत्र में गुजरात विद्यापीठ के कुलसचित एंव कृषि वैज्ञानिक डॉ0 राजेन्द्र खिमानी ने पर्यावरण संरक्षण, कचरा प्रबंधन एवं आर्गेनिक खेती पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को कौशल विकास का प्रशिक्षण शुरू से ही दिया जानी चाहिए, यह विद्यार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ाने के साथ ही कॅरियर बनाने में सहायक होगा।
तीसरे दिन- प्रथम सत्र में दयानंद आर्य कन्या महाविद्यालय, नागपुर की पूर्व प्रधानाचार्या एवं शिक्षाविद् डॉ० वन्दना कुशलानी ने कहा कि भारत, भारतीयता एवं भारतीय संस्कृति को आचार्यों ने गढ़ा है। भारत के इतिहास में ऐसे अनेको शिक्षक हुए है जिनके दम पर भारत के लोगों ने दुनियाभर में परचम लहराया है और आज भी लहरा रहे हैं।
दूसरे सत्र में कादी सर्वा विश्वविद्यालय, गांधीनगर के कम्प्यूटर साइंस विभाग के चेयरमैन प्रोफेसर नलीन जानी ने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कॅरियर की बात की और कहा कि कम्प्यूटर साइंस में जितना महत्व कम्प्यूटरी ज्ञान का है उतनी ही जानकारी मनोविज्ञान, सहित्य, भाषा, अर्थशास्त्र विषय की होना भी जरूरी हैं। इस दौरान उन्होंने डिजिटल बोर्ड की उपयोगिता, महत्व एवं गणों की चर्चा की और कहा यह तकनीकी समय बचाने में सक्षम है, शेष समय का सदउपयोग करना तकनीकी के उपयोग करने वाले के हाथ में है।
चौथे दिन- प्रथम सत्र में भारतीय जनसंचार संस्थान, दिल्ली स्थित हिंदी पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष एवं मीडिया विशेषज्ञ प्रो0 हेमन्त जोशी ने ‘नवमाध्यामों का शिक्षण में योगदान‘ विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए कहा कि- शिक्षक, शिक्षा का एक अनिवार्य तत्व है। ऑनलाइन शिक्षण व्यवस्था में शिक्षक का महत्व कम हो जाएगा, यह कहना अतार्कित है। शिक्षक-विद्यार्थी में जुड़ाव बनाए रखने के लिए अवाश्यक है कि उसके रूचि का ख्याल रखते हुए उससे संवाद बनाये रखा जाय।
दूसरे सत्र में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ स्थित महामना मदनमोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक एवं संचारविद् प्रो0 ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि भारत की शोध परम्परा बहुत ही प्रचीन है। अमरकोश सबसे पुराना उत्तर वैदिक काल का शोध है।
पांचवे दिन- प्रथम सत्र में पं0 दीनदयाल पेट्रोलियम विश्वविद्यालय, गांधीनगर के लिबरल साइंस विभाग में प्रोफेसर एवं शिक्षाविद् डॉ० प्रदीप मलिक ने कहा कि इंटरनेट पर साहित्यों का भंडार है। ये साहित्य प्रमाणिकता साथ आसान उपलब्धता रखते हैं। डिजिटल लाइब्रेरी, गूगल स्कॉलर, जेएसटीआर जैसे कई माध्यम हैं जिनके सहयोग से ऑनलाइन साहित्यों का सर्वेक्षण से लेकर आंकड़ों का संग्रह किया जा सकता है।
दूसरे सत्र में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के संचार अध्ययन एवं शोध विभाग के अध्यक्ष प्रो0 धीरेन्द्र पाठक ने कहा कि धर्म एक उत्प्रेरक है। प्रिंटिंग तकनीक के इज़ाद में भी धर्म ने एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य किया है। क्योंकि पहला समाचार पत्र भी धर्म के उद्देश्य के लिए प्रकाशित किया गया। डिजाइन, मेकअप और ले-आउट पर चर्चा करते हुए उन्होंने प्रतिस्पर्धा के दौर में इसे जरूरी बताया और कहा साज-सज्जा पत्रकारिता नहीं बल्कि एक कला है, जो पत्रकारिता का वाहक है।
छठे दिन- प्रथम सत्र में गुरू जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्यागिक विश्वविद्यालय, हिसार के पूर्व डीन एवं मीडिया विशेषज्ञ प्रो0 मनोज दयाल ने ‘टिचिंग टेक्नोलॉजी एवं न्यू मीडिया‘ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि किसी भी प्रौद्योगिकी का उपयोग कार्य में विस्तार लाता है। पहिये के आविष्कार को पैर का और कम्प्यूटर को मस्तिष्क का विस्तार माना जाना चाहिए। शिक्षा में तकनीकी प्रयोग पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि तकनीकी साधन है साध्य नहीं।
दूसरे सत्र में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई के पूर्व कुलपति प्रो0 राममोहन पाठक ने ‘संचार माध्यमों की भाषाः शिक्षण के आयाम‘ विषय पर व्याख्यान देते हुए भाषा को संस्कार की वस्तु बताया। उन्होंने कहा भाषा निबद्ध करना बहुत जरूरी है, इसकी शिक्षा दी जानी चाहिए। संचार और भाषा के संबन्धों को बताते हुए उन्होंने कहा कि संचार की प्रबुद्ध परम्परा है। संचार की भाषाओं का बहुत बड़ा गुलदस्ता है। इस गुलदस्ता को समृद्ध करना और जीवंतता को बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है।
सातवें दिन- प्रथम सत्र में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व प्रोजेक्ट मैनेजर एवं प्रसिद्ध फिल्म निर्माता कमलेश उदासी ने कहा कि तकनीकी कभी भी शिक्षक का स्थान नहीं ले सकती है, यह एक सप्लिमेंट है। वर्तमान में विद्यार्थियों के साथ किये जाने वाले कम्यूनिकेशन को प्रभावी बनाने के लिए इसे क्रिएटिव बनाना अत्यंत ही जरूरी हो गया है। इस काम को मल्टीमीडिया टूल के माध्यम से आसानी से किया जा सकता है।
दूसरे सत्र में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी एवं प्रौद्यागिकी अनुवाद परियोजना के प्रभारी डॉ० राज नारायण अवस्थी ने ‘प्रौद्यागिकी अनुवाद‘ विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि वैज्ञानिक अनुवाद, अत्यंत सार्थक, सार्वत्रिक एवं अनूदित प्रौद्योगिकी हेतु लाभप्रद है। आज अनुवाद की मूल चुनौती नित-नवीन शब्दावली है। मीडिया के क्षेत्र में काम करते हुए पत्रकार को भाषा की अदम्य गहराइयों तक देखना चाहिए। किसी भारतीय भाषा का किस रूप में इस्तेमाल किया जाता है इसको जानना पत्रकार के लिए आवश्यक है।
आठवें दिन- प्रथम सत्र में हिमांचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला के स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म, मास कम्यूनिकेशन एण्ड न्यू मीडिया के डीन प्रो0 प्रदीप नायर ने कहा कि रिसर्च पब्लिकेशन में एडिटर और रिव्यूवर की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ये ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों की टीम है, जो पब्लिकेशन और रिव्यू नीति के अनुसार काम करते हुए पब्लिकेशन से लेकर रिसर्च तक की गुणवत्ता को बनाए रखने का काम करती है। इस दौरान कई बार रिसर्च को खारिज और सुधार की भी स्थिति बनती है। लेकिन इनका उद्देश्य लेखक को दण्ड देना नहीं बल्कि रिसर्च की गुणवत्ता सुधारना होता है।
दूसरे सत्र में गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के प्रोफेसर डॉ० विनोद पाण्डेय ने बतौर विषय विशेषज्ञ कहा कि प्राचीन काल में विद्या, गुरू-शिष्य परम्परा पर आधारित थी। भारत को विश्वगुरू बनाने में इस परम्परा की महती भूमिका रही है। हमेशा ही शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगिण विकास करना रहा है। इसके लिए गुरू हमेशा प्रयासरत रहता है।
नौवें दिन- प्रथम सत्र में महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकुट के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो0 वीरेन्द्र कुमार व्यास ने कहा कि दूरस्थ शिक्षा कोई नई शिक्षा पद्धति नहीं है बल्कि एकलव्य का धनुर्विधा प्राप्ति का तरीका भी दूरस्थ पद्धति से ही था। वर्तमान में इस पद्धति को ओडीएल (ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग) नाम दिया गया है। यह भारतीय शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्ततन है और न्यू मीडिया तकनीकी और डिस्टेंस एजुकेशन के सहयोग से ‘एजुकेशन फॉर आल’ की संकल्पना को साकार किया जा सकता है।
दूसरे सत्र में झारखण्ड केन्द्रीय विश्वविद्यालय, राची के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 संतोष तिवारी ने ‘वर्चुअल क्लासरूम अक्रास कंटेंट‘ विषय पर चर्चा में कहा कि वर्चअल क्लास की अपनी तकनीकी सीमाएं हैं, यह रेगुलर क्लासरूम का स्थान कभी नहीं ले सकती। इस दौरान उन्होंने कहा कि तकनीकी कारणों से वर्चुअल क्लासरूम में वीडियो के माध्यम से विद्यार्थियों से संवाद सुचारू रूप से कर पाना सम्भव नहीं है। जबकि विद्यार्थियों से इंटरेक्शन डवलप करना अत्यन्त आवश्यक है।
दसवें दिन- प्रथम सत्र में स्वामी रामानन्द तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालयए महाराष्ट्र के डायरेक्टर प्रो0 दीपक सिंदे ने ‘भारतीय संविधान एवं कापीराइट‘ विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रेस की स्वतंत्रता बुनियादी जरूरत है। प्रेस की आजादी का मतलब, किसी भी व्यक्ति को अपनी राय कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर करने का अधिकार है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के मीडिया स्टडीज विभाग के डॉ0 संजय सिंह बघेल ने बतौर विशेषज्ञ ‘शिक्षण में न्यू मीडिया तकनीकी के उभरते विविध आयामों‘ की चर्चा किया। उन्होंने कहा कि शिक्षण के कार्य में सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढा है। न्यू मीडिया ने पूरी शिक्षण पद्धति को रोचक बना दिया है। ऐसे में शिक्षक वर्ग को सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी टूल्स से नाता जोड़ना होगा।
ग्यारवें दिन- प्रथम सत्र में काशी विद्यापीठ स्थित पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ0 अर्जुन तिवारी ने कहा कि नूतन उपकरण संचार-क्रांति के सूत्रधार हैं। इस क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए तकनीकी का विकास जरूरी है लेकिन इनका विकास हिन्दी में किया जाय तो अतिउत्तम होगा।
दूसरे तकनीकी सत्र में गुजराज विद्यापीठ के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की अध्यक्ष प्रो0 पुनिता हराणे ने कहा कि बदलते परिवेश में हमारे रहन-सहन से लेकर खान-पान तक को मास मीडिया तय करने लगा। इसी बीच सोशल मीडिया की सूचनाओं ने कई धारणाओं का निर्माण करने और उसे खारिज करने का काम किया है।
बारहवें दिन- प्रथम सत्र में प्रसिद्ध भूगर्भ वैज्ञानिक एवं महिला महाविद्यालय बीएचयू में प्रोफेसर डॉ० देवब्रत पाठक ने ‘शोध में प्लेगरिज्म‘ विषय पर व्याख्यान में कहा कि शैक्षिक जगत में एपीआई की बढ़ती महत्ता के कारण से बौद्धिक रचनाओं में प्लेगरिज्म बढ़ता जा रहा है। यह एकेडमिक क्राइम है और इसमें सजा का प्रावधान है। यह लेखक और पाठक दोनों समाज पर बुरा प्रभाव डालता है।
दूसरे सत्र में गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद में पत्रकारिता एवं जनसंचार की प्रो0 सोनल पाण्डया ने कहा कि कोविड काल में तकनीकी ने वर्चुअल टीचिंग के लिए आकर्षित किया है। लेकिन ई-लर्निंग में विद्यार्थियों की समास्याएं और सहुलियतें नजरअंदाज होती दिखाई दे रही हैं, इसका हमें ख्याल रखना होगा।
तेरहवें दिन- प्रथम सत्र में भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के अंग्रेजी पत्रकारिता की निदेशक, प्रो0 सुरभि दहिया, ने कहा कि भारतीय मीडिया इंडस्ट्री तेजी से बढ़ोत्तरी हासिल कर रही है। इसमें प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल मीडिया में से किसी की भागीदारी को कम कर नहीं आंका जा सकता है। डिजिटल युग में मीडिया के बिजनेस माडल में काफी बदलाव आया है। आज विज्ञापन के साथ ही सब्सक्रिप्शन और एप्स भी बिजनेस माडल को प्रभावित कर रहे हैं।
दूसरे सत्र में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने कहा कि परिस्थितियां चाहे जैसी हो मीडिया को अपना प्रश्न नहीं छोड़ना चाहिए। मीडिया संगठनों को जनआकांक्षा को ध्यान रखते हुए सवाल करने का दायित्व निभाना होगा तभी लोगों में विश्वसनीयता कायम रहेगी।
चौदहवें दिन- प्रथम सत्र में वरिष्ठ पत्रकार एवं मध्यप्रदेश सरकार द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘मध्यप्रदेश माध्यम‘ के प्रधान सम्पादक प्रो0 पुष्पेद्र पाल सिंह ने बतौर विशेषज्ञ ‘पब्लिक रिलेशन में सूचना प्रौद्योगिकी की महत्ता‘ विषय पर व्याख्यान दिया। इस दौरान उन्होंने कहा कि कार्पोरेट समेत सभी क्षेत्रों में रिलेशनशीप और रेपोटेशन मैनेजमेंट की जरूरत बढ़ी है। पब्लिक रिलेशन में तकनीकी हस्तक्षेप की बात करते हुए उन्होंने कहा कि इंटरनेट, सेलफोन और सोशल मीडिया ने जनसंपर्क की दुनिया को बदल दिया है।
दूसरे सत्र में भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक प्रो0 संजय द्विवेदी ने कहा कि शिक्षा का मूल उद्देश्य मनुष्य और मनुष्यता का निमार्ण करना होना चाहिए। शिक्षा और तकनीकी समाज के सशक्तिकरण का माध्यम है। नई शिक्षा नीति में तकनीकी पर जोर है। शिक्षाविदों की इसे धरातल पर उतारने की जिम्मेदारी है।
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